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जब क्रोध आये तब उसे कैसे नियन्त्रित करें?
Anger face show your  negative personalty  
How to control anger, when came close to him?  
सफलता के स्वप्न सब लोग सजोंते हैं । कुछ लोग सिर्फ सफलता का स्वप्न देखते हैं । जबकि जागरूक व्यक्ति अपने लक्ष्य की सफलता के प्रति सजग रहते हैं और सफलता के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। पर सफलता की प्राप्ति में क्रोध सबसे बड़ी बढ़ा होती है ।

आप चाहे जितने भी talented हो, चाहे जितने भी loving body हो या चाहे जितनी भी pleasant personality हो पर यदी क्रोध आप कि personality का हिस्सा है तो आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लें सफलता आप से दूर रहेगी, यदी आप success पा भी गये तो वो टिकी नहीं रहेगी ।    

किसी को भी क्रोध आना एक आम बात है, पर इस कोढ़ के कारण अपना और दुसरो का बहुत नुकसान होता है । लेकिन इस क्रोध के कारण दूसरों का कम और अपना ज्यादा नुकसान होता है इसलिए अपने आप को नियंत्रित करना बहुत ही आवश्यक है । क्रोध आप की personality पर बुरा असर डालता है । आप चाहे जितने अच्छे हो, या जितने भी लोगों के लिए helpful हो यदी आप को क्रोध आता है तो आप किसी के भी Favorites नहीं बन सकते । इसके लिए आप को अपने क्रोध को नियंत्रित करना ही होगा ।

जब आप को क्रोध आये तब क्या करें —
Ø क्रोध को जीतना आसान नहीं है पर मौन इसे जीतने का सबसे आसान तरीका है। अर्थात् जब हमें किसी पर क्रोध आये तो हमें शांत और मौन हो जाना चाहिए । और उस बात को थोड़े समय के लिए टाल देना चाहिए जिसके कारण क्रोध आने की स्थिति पैदा हुई हो और जब क्रोध शांत हो जाये तब उस बात पर विचार करना चाहिए और उस problem को solve करने के method ढूढने चाहिए ।
Ø क्रोध को नियंत्रित करने का एक तरीका यह है की जिस घटना के कारण आप को क्रोध आया है उसे अपने नजरिये की जगह दूसरो के नजरिये से भी देखें । तब आप कुछ हद तक वस्तुतः परिस्थिति को समझ सकेगें और उसके निवारण का उपाय ढूंढ पायेंगे ।
Ø लोगों कि गलतियों के लिए उनको क्षमा करने की आदत डाले । जिस प्रकार जब हम स्वयं कोई गलती करते हैं तो यही चाहते है कि सामने वाला इस बात को भूल जाये और हमे क्षमा कर दे उसी प्रकार आप भी दूसरे कि जगह खुद को रख कर देखे और क्षमा करने की आदत डालें।
Ø दूसरों को क्षमा करने में जहाँ आप को स्वयं में अच्छा महशूस होगा, वही आप के आस –पास के लोगों में आप के प्रति respect बढेगी। आप लोंगों के बीच popular होंगे ।   
Ø स्वयं को कल्पनाओं में नहीं वास्तविकताओं में जीने को प्रेरित करें
Ø क्रोध का एक कारण अव्यवहारिक इक्षाओं का होना । जीवन की मूल आवश्यकताओं को समझें व उनको पूरा करने के लिए मेहनत करे न कि शेख चिल्ली कल्पनाओं व अव्यवहारिक इक्षाओं की पूर्ति के लिए । क्योंकि जब इन इक्षाओं कि पूर्ति में असफलता मिलती के तो हमारे अहं को ठेस लगती है और हम क्रोधित होते हैं ।
Ø अपने आप को कभी दूसरों से न तो तुच्छ समझे और न ही दूसरों से सर्वोपरी क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं को अपनी ही दृष्टि में तुच्छ मानता है , वही वस्तुतः तुच्छ है । और जो सिर्फ स्वयं को ही श्रेष्ठ मानता है और किसी कारण जब उसका जब अहं पोषित नहीं होता तो क्रोध आने कि स्थिति पैदा होती है । ये दोनों ही स्थितियां आपकी personalty को बाधित करती हैं ।

आप को personality development पर ये article कैसा लगा ? कृपया कमेंट्स के द्वारा जरूर बताएं । यदी आप को पसंद आया हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ share भी करें ।
अंत में धन्यवाद् !

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Personal Development Article in Hindi-- How to control anger, when came close to him?


जब क्रोध आये तब उसे कैसे नियन्त्रित करें?
Anger face show your  negative personalty  
How to control anger, when came close to him?  
सफलता के स्वप्न सब लोग सजोंते हैं । कुछ लोग सिर्फ सफलता का स्वप्न देखते हैं । जबकि जागरूक व्यक्ति अपने लक्ष्य की सफलता के प्रति सजग रहते हैं और सफलता के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। पर सफलता की प्राप्ति में क्रोध सबसे बड़ी बढ़ा होती है ।

आप चाहे जितने भी talented हो, चाहे जितने भी loving body हो या चाहे जितनी भी pleasant personality हो पर यदी क्रोध आप कि personality का हिस्सा है तो आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लें सफलता आप से दूर रहेगी, यदी आप success पा भी गये तो वो टिकी नहीं रहेगी ।    

किसी को भी क्रोध आना एक आम बात है, पर इस कोढ़ के कारण अपना और दुसरो का बहुत नुकसान होता है । लेकिन इस क्रोध के कारण दूसरों का कम और अपना ज्यादा नुकसान होता है इसलिए अपने आप को नियंत्रित करना बहुत ही आवश्यक है । क्रोध आप की personality पर बुरा असर डालता है । आप चाहे जितने अच्छे हो, या जितने भी लोगों के लिए helpful हो यदी आप को क्रोध आता है तो आप किसी के भी Favorites नहीं बन सकते । इसके लिए आप को अपने क्रोध को नियंत्रित करना ही होगा ।

जब आप को क्रोध आये तब क्या करें —
Ø क्रोध को जीतना आसान नहीं है पर मौन इसे जीतने का सबसे आसान तरीका है। अर्थात् जब हमें किसी पर क्रोध आये तो हमें शांत और मौन हो जाना चाहिए । और उस बात को थोड़े समय के लिए टाल देना चाहिए जिसके कारण क्रोध आने की स्थिति पैदा हुई हो और जब क्रोध शांत हो जाये तब उस बात पर विचार करना चाहिए और उस problem को solve करने के method ढूढने चाहिए ।
Ø क्रोध को नियंत्रित करने का एक तरीका यह है की जिस घटना के कारण आप को क्रोध आया है उसे अपने नजरिये की जगह दूसरो के नजरिये से भी देखें । तब आप कुछ हद तक वस्तुतः परिस्थिति को समझ सकेगें और उसके निवारण का उपाय ढूंढ पायेंगे ।
Ø लोगों कि गलतियों के लिए उनको क्षमा करने की आदत डाले । जिस प्रकार जब हम स्वयं कोई गलती करते हैं तो यही चाहते है कि सामने वाला इस बात को भूल जाये और हमे क्षमा कर दे उसी प्रकार आप भी दूसरे कि जगह खुद को रख कर देखे और क्षमा करने की आदत डालें।
Ø दूसरों को क्षमा करने में जहाँ आप को स्वयं में अच्छा महशूस होगा, वही आप के आस –पास के लोगों में आप के प्रति respect बढेगी। आप लोंगों के बीच popular होंगे ।   
Ø स्वयं को कल्पनाओं में नहीं वास्तविकताओं में जीने को प्रेरित करें
Ø क्रोध का एक कारण अव्यवहारिक इक्षाओं का होना । जीवन की मूल आवश्यकताओं को समझें व उनको पूरा करने के लिए मेहनत करे न कि शेख चिल्ली कल्पनाओं व अव्यवहारिक इक्षाओं की पूर्ति के लिए । क्योंकि जब इन इक्षाओं कि पूर्ति में असफलता मिलती के तो हमारे अहं को ठेस लगती है और हम क्रोधित होते हैं ।
Ø अपने आप को कभी दूसरों से न तो तुच्छ समझे और न ही दूसरों से सर्वोपरी क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं को अपनी ही दृष्टि में तुच्छ मानता है , वही वस्तुतः तुच्छ है । और जो सिर्फ स्वयं को ही श्रेष्ठ मानता है और किसी कारण जब उसका जब अहं पोषित नहीं होता तो क्रोध आने कि स्थिति पैदा होती है । ये दोनों ही स्थितियां आपकी personalty को बाधित करती हैं ।

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win the life


मन के हारे हार, मन के जीते जीत


किसी विद्वान ने क्या खूब कहा है- “मन के हारे हार मन के जीते जीत है”

इस वाक्य कि गहराई में जाया जाये, तो इस वाक्य कि सार्थकता का पता चलता है कि मन कितना बलवान है जो किसी को भी हरा या जीता सकता है । पर ये सच है मन येसा कर सकता है क्योंकि हमारे शास्त्रों में मन को ही बंधन और मन को ही मुक्ति का कारण माना  गया है । शुद्ध, शांत, निर्मल और स्थिर मन मनुष्य को उत्कर्ष कि ओर ले जाता है वही पर चंचल, अस्थिर कुलषित एवं कुसंस्कारों से भरा हुआ मन मनुष्य को पतन व पराभव के मार्ग पर धकेलता है ।

मन तो स्वभाव से ही चंचल होता है इस कारण यह किसी एक विषय पर नहीं टिकता ही नहीं है बार – बार एक को छोड़ दूसरे कि तरफ आकर्षित हो उस ओर दौड़ता रहता है । मन न जाने कितने अनगिनत संस्कारों का आगार होता है और वे समय – समय पर मन को अपनी ओर प्रेरित करते रहते हैं, इस संस्कारों को हटा पाना आसान नहीं होता है और जो येसा करते हैं वे महारथी कि तरह अपने goal कि तरफ बिना किसी विघ्न बाधा के बढ़ते जाते हैं ।

एक बार स्वयं महा रथी अर्जुन ने मन कि चंचलता पर भगवान श्रीकृष्ण से कहा था-

चच्चलम हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दढम ।
तस्याहम निग्रहम मन्ये वायोरिव सुदुष्करम ।।   
                  
अर्थात- “ है कृष्ण ! यह मन बड़ा ही चंचल है, मनुष्य को मथ डालता है। यह बड़ा शक्ति शाली है । वायु कि तरह ही मन को वश में करा कठिन मानता हूँ ।“

यह सुन कर भगवान् कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा- इसे चंचल व प्रमथन nature वाले मन को अपने वश में करने का उपाय सुनो-

  असंशयं महा बाहो मनो दुर्निग्रहम चलं
  अभ्यासेन तु कौन्तेय वैरा।ग्येण च गृहंते ।।

अर्थात- “ हे महा बाहो ! नि: संदेह मन बड़ा चंचल है । यह रुक नहीं सकता, परन्तु हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्य से यह वश में किया जा सकता है ।“

    अतः मन को निर्मल संस्कारवान बनाने और उसकी चंचलता को विराम देने के लिए उचित कदम जीवन में उठाने आवश्यक है जिससे life का specified aim पाने के लिए योजना बनाई जा सके । और उसी के अनरूप भावनाओं और विचारों के चिंतन में मन को लगा देना  चाहिए, इसके आलावा मन को और कही नहीं जाने देना चाहिए । मन  चाहे या न चाहे, वह कितना भी भागे, उसे पकड़ कर अपने लक्ष्य पर बार – बार लगाना चाहिए । इसके अलावा बाकी सभी विरोधी thoughts व emotions की तरफ से मन को हटाने का पूरा प्रयत्न करते रहना चाहिए । इससे मन एक लक्ष्य पर लगने लगता है और इस एकाग्र मन को जिस दिशा में भी लगाते हैं उस दिशा में सफलता हाथ फेलाये राहों में आप का इन्तजार करती है, और इसीलिए कहते है कि मन के हारे हार और मन के जीते जीत है ।                             

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Man ke haare Haar, Man Ke jeete jeet


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किसी विद्वान ने क्या खूब कहा है- “मन के हारे हार मन के जीते जीत है”

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मन तो स्वभाव से ही चंचल होता है इस कारण यह किसी एक विषय पर नहीं टिकता ही नहीं है बार – बार एक को छोड़ दूसरे कि तरफ आकर्षित हो उस ओर दौड़ता रहता है । मन न जाने कितने अनगिनत संस्कारों का आगार होता है और वे समय – समय पर मन को अपनी ओर प्रेरित करते रहते हैं, इस संस्कारों को हटा पाना आसान नहीं होता है और जो येसा करते हैं वे महारथी कि तरह अपने goal कि तरफ बिना किसी विघ्न बाधा के बढ़ते जाते हैं ।

एक बार स्वयं महा रथी अर्जुन ने मन कि चंचलता पर भगवान श्रीकृष्ण से कहा था-

चच्चलम हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दढम ।
तस्याहम निग्रहम मन्ये वायोरिव सुदुष्करम ।।   
                  
अर्थात- “ है कृष्ण ! यह मन बड़ा ही चंचल है, मनुष्य को मथ डालता है। यह बड़ा शक्ति शाली है । वायु कि तरह ही मन को वश में करा कठिन मानता हूँ ।“

यह सुन कर भगवान् कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा- इसे चंचल व प्रमथन nature वाले मन को अपने वश में करने का उपाय सुनो-

  असंशयं महा बाहो मनो दुर्निग्रहम चलं
  अभ्यासेन तु कौन्तेय वैरा।ग्येण च गृहंते ।।

अर्थात- “ हे महा बाहो ! नि: संदेह मन बड़ा चंचल है । यह रुक नहीं सकता, परन्तु हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्य से यह वश में किया जा सकता है ।“

    अतः मन को निर्मल संस्कारवान बनाने और उसकी चंचलता को विराम देने के लिए उचित कदम जीवन में उठाने आवश्यक है जिससे life का specified aim पाने के लिए योजना बनाई जा सके । और उसी के अनरूप भावनाओं और विचारों के चिंतन में मन को लगा देना  चाहिए, इसके आलावा मन को और कही नहीं जाने देना चाहिए । मन  चाहे या न चाहे, वह कितना भी भागे, उसे पकड़ कर अपने लक्ष्य पर बार – बार लगाना चाहिए । इसके अलावा बाकी सभी विरोधी thoughts व emotions की तरफ से मन को हटाने का पूरा प्रयत्न करते रहना चाहिए । इससे मन एक लक्ष्य पर लगने लगता है और इस एकाग्र मन को जिस दिशा में भी लगाते हैं उस दिशा में सफलता हाथ फेलाये राहों में आप का इन्तजार करती है, और इसीलिए कहते है कि मन के हारे हार और मन के जीते जीत है ।                             

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