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यश की कामना

Kudos to wish

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एक गाँव में दो मुर्गे रहते थे एक का नाम चमकू और दूसरे का चम्पू था । दोनों को हमेशा अपने यश की चिंता रहती थी, कि उनका yash दूसरे से ज्यादा हो। चूँकि दोनों ही अपने को श्रेष्ठ मानते थे इसलिए उनमें हमेशा प्रतिस्पर्धा छिड़ी रहती थी।  खुद को सर्व शक्तिशाली मनवाने के लिए दोनों हमेशा ही लड़ते रहते थे ।

एक दिन दोनों village में एक कूड़े के ढेर पर बैठे हुए धूप सेंक रहे थे । कि अचानक दोनों में खुद हो great बताने में बहस छिड़ गई औए ये बस इतनी बढ़ी की दोनों में बातों बातों से शुरू हो कर, हाथापायी में बदल गई। उनका ये fight देखने के लिए सारे मुर्गे और Chickens इकट्ठे हो गये।

चमकू और चम्पू एक दूसरे पर वार करने लेगे। कभी चमकू भारी पड़ता तो कभी चम्पू इस तरह उनका युद्ध बहुत बढ़ता ही गया, पर अंत में चम्पू, चमकू से शरीरिक रूप से बलवान होने के कारण जीत गया ; और चम्पू ने चमकू को पराजित कर भगा दिया।

ये युद्ध देख रहे मुर्गे – मुर्गियाँ ने चम्पू को घेर लिया और उसकी प्रसंशा करने लगे। वे सब चम्पू मुर्गे का यशगान करने लगे। वे उससे बोले तुम तो बहुत बलिष्ट औए श्रेष्ठ हो जो तुमने चमकू जैसे बलवान मुर्गे को हरा दिया।

चम्पू मुर्गा ने जब अपना यश गान सुना, तो वो ख़ुशी से फुला नहीं समाया और उसके ह्रदय में अपना यश और बढ़ाने कि कामना तीव्र हो गयी । और उसने उन सब मुर्गे और मुर्गियों से कहा कि आस- पास के हर गाँव में मेरी कीर्ति का बखान होना चाहिए, मेरा यश पहुँचना चाहिए।

अपने यश को चारों तरफ फैलाने की तीव्र कामना से वो एक बहुत ही ऊँचे टीले पर चढ़ गया और सब से बोला देखो में कितनी उचाई तक चढ़ सकता हूँ। इतने ऊँचे टीले पर क्या कोई दूसरा चढ़ सकता है । फिर उसने बड़े गर्व से अपने पंखों को फड़ फड़ाया और ऊँचे स्वर से बोला –“ मेरे समान यहाँ दूसरा कोई और मुर्गा नहीं है । मैं सब से बलवान हूँ । मैं एक विजयी मुर्गा हूँ ।”

चम्पू जब यह बोल रहा था तब उस ऊँचे टीले के ऊपर एक गिद्ध मडरा रहा था । उसने इतनी ऊँचाई पर चम्पू मुर्गे को अकेले देखा तो उसने एक झपट्टा मारा और चम्पू को अपने पंजों में दबोचकर उड़ गया ।

friends, चम्पू ने खुद को महान और विजयी तो मनवा लिया, पर महान बने के लोभ में अपनी life भी गवां दी । कभी- कभी यश,विजय और महानता की कामना व्यक्ति का सर्वनाश कर देती है ।


Friend’s, आप को मेरी “Kudos to wish” motivational story in Hindi में कैसी लगी? क्या ये story सबकी life (personality) में positivity ला सकने में कुछ सहयोगी हो सकेगी, if yes तो please comments के द्वारा जरुर बताये A  
       
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Kudos to wish- a motivational story in Hindi



यश की कामना

Kudos to wish

Kudos to wish

एक गाँव में दो मुर्गे रहते थे एक का नाम चमकू और दूसरे का चम्पू था । दोनों को हमेशा अपने यश की चिंता रहती थी, कि उनका yash दूसरे से ज्यादा हो। चूँकि दोनों ही अपने को श्रेष्ठ मानते थे इसलिए उनमें हमेशा प्रतिस्पर्धा छिड़ी रहती थी।  खुद को सर्व शक्तिशाली मनवाने के लिए दोनों हमेशा ही लड़ते रहते थे ।

एक दिन दोनों village में एक कूड़े के ढेर पर बैठे हुए धूप सेंक रहे थे । कि अचानक दोनों में खुद हो great बताने में बहस छिड़ गई औए ये बस इतनी बढ़ी की दोनों में बातों बातों से शुरू हो कर, हाथापायी में बदल गई। उनका ये fight देखने के लिए सारे मुर्गे और Chickens इकट्ठे हो गये।

चमकू और चम्पू एक दूसरे पर वार करने लेगे। कभी चमकू भारी पड़ता तो कभी चम्पू इस तरह उनका युद्ध बहुत बढ़ता ही गया, पर अंत में चम्पू, चमकू से शरीरिक रूप से बलवान होने के कारण जीत गया ; और चम्पू ने चमकू को पराजित कर भगा दिया।

ये युद्ध देख रहे मुर्गे – मुर्गियाँ ने चम्पू को घेर लिया और उसकी प्रसंशा करने लगे। वे सब चम्पू मुर्गे का यशगान करने लगे। वे उससे बोले तुम तो बहुत बलिष्ट औए श्रेष्ठ हो जो तुमने चमकू जैसे बलवान मुर्गे को हरा दिया।

चम्पू मुर्गा ने जब अपना यश गान सुना, तो वो ख़ुशी से फुला नहीं समाया और उसके ह्रदय में अपना यश और बढ़ाने कि कामना तीव्र हो गयी । और उसने उन सब मुर्गे और मुर्गियों से कहा कि आस- पास के हर गाँव में मेरी कीर्ति का बखान होना चाहिए, मेरा यश पहुँचना चाहिए।

अपने यश को चारों तरफ फैलाने की तीव्र कामना से वो एक बहुत ही ऊँचे टीले पर चढ़ गया और सब से बोला देखो में कितनी उचाई तक चढ़ सकता हूँ। इतने ऊँचे टीले पर क्या कोई दूसरा चढ़ सकता है । फिर उसने बड़े गर्व से अपने पंखों को फड़ फड़ाया और ऊँचे स्वर से बोला –“ मेरे समान यहाँ दूसरा कोई और मुर्गा नहीं है । मैं सब से बलवान हूँ । मैं एक विजयी मुर्गा हूँ ।”

चम्पू जब यह बोल रहा था तब उस ऊँचे टीले के ऊपर एक गिद्ध मडरा रहा था । उसने इतनी ऊँचाई पर चम्पू मुर्गे को अकेले देखा तो उसने एक झपट्टा मारा और चम्पू को अपने पंजों में दबोचकर उड़ गया ।

friends, चम्पू ने खुद को महान और विजयी तो मनवा लिया, पर महान बने के लोभ में अपनी life भी गवां दी । कभी- कभी यश,विजय और महानता की कामना व्यक्ति का सर्वनाश कर देती है ।


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सबसे बड़ा धन- संतोष  

the biggest money- satisfaction

एक saint भ्रमण पर निकले हुए थे । उन्हें रास्ते में एक king मिले, जो अपने राज्य का विस्तार करने के लिए अपने पड़ोसी राज्य पर हमला करने निकला हुआ था। great saint को देख कर king ने saint को wish किया और उनसे बोला –“ महाराज ! मैं एक चक्रवर्ती सम्राट हूँ । मैं अपार धन का स्वामी हूँ। बहुत धन- दौलत मेरे पास है और मैं अपने इस खजाने को और बढ़ना चाहता हूँ इसलिए अपने पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने निकला हूँ। आप मुझे आशीर्वाद दें कि मैं विजयी हूँ और मेरा धन और बढ़े व बढ़ता रहे ।” saint ने धीरे से smile किया और king को हाथ आगे करने को बोला । king ने hand आगे किया । saint ने king के hand पर one rupees का सिक्का रख दिया।

king को बड़ा आश्चर्य हुआ । वह sage से बोला –“महाराज ! आपने शायद ध्यान से सुना नहीं कि मैं एक बड़ा सम्राट हूँ । मेरे पास बहुत धन है। मैं धनवान हूँ। मुझे इस एक रूपये की आवश्यकता नहीं है ।” saint बोले –“ बेटा! तेरी बात सुनकर ही मैने तुझे ये एक रुपया का सिक्का दिया है । मुझे ये एक रूपये का सिक्का पड़ा हुआ मिला था और मैंने सोचा था कि इसे सबसे दरिद्र व्यक्ति को दूँगा । आज तुम से मिल कर लगा कि सबसे दरिद्र यदि कोई है, तो वो तुम ही हो, जो अपार धन- संपदा का स्वामी होते हुए भी दूसरों का घर लूटने चला है ।” saint की बात सुनते ही राजा का सिर शरम से झुक गया और उसे अपनी गलत चाह का भान हो गया और ये एहसास हुआ कि वो गलत है । सबसे बड़ा धन तो संतोष है । जिसके पास संतोष नहीं है उसके लिए अपार धन भी कम पड़ता है और जिसके पास संतोष है उसे फिर अन्य धन- आकर्षण आदि विचलित नहीं कर सकते। जिनके पास सबसे बड़ा धन संतोष का है वे हमेशा अपने और दूसरे सभी लोगों के जीवन में सुख व वैभव और उन्नति का कारण बनते है । और जिनके पास सबसे बड़ा धन संतोष का नहीं है वे दूसरों को लूटते हैं। 
            
फिर king ने अपने जीवन को संतोष कि राह पर चलाने के लिए, खुद को बदलने का संकल्प लिया । और saint का आशीर्वाद ले, खुद को सबसे बड़ा धन संतोष को प्राप्त करने चल पड़ा। 
    
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The biggest Money - Satisfaction " a motivational story in Hindi"/ सबसे बड़ा धन- संतोष


सबसे बड़ा धन- संतोष  

the biggest money- satisfaction

एक saint भ्रमण पर निकले हुए थे । उन्हें रास्ते में एक king मिले, जो अपने राज्य का विस्तार करने के लिए अपने पड़ोसी राज्य पर हमला करने निकला हुआ था। great saint को देख कर king ने saint को wish किया और उनसे बोला –“ महाराज ! मैं एक चक्रवर्ती सम्राट हूँ । मैं अपार धन का स्वामी हूँ। बहुत धन- दौलत मेरे पास है और मैं अपने इस खजाने को और बढ़ना चाहता हूँ इसलिए अपने पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने निकला हूँ। आप मुझे आशीर्वाद दें कि मैं विजयी हूँ और मेरा धन और बढ़े व बढ़ता रहे ।” saint ने धीरे से smile किया और king को हाथ आगे करने को बोला । king ने hand आगे किया । saint ने king के hand पर one rupees का सिक्का रख दिया।

king को बड़ा आश्चर्य हुआ । वह sage से बोला –“महाराज ! आपने शायद ध्यान से सुना नहीं कि मैं एक बड़ा सम्राट हूँ । मेरे पास बहुत धन है। मैं धनवान हूँ। मुझे इस एक रूपये की आवश्यकता नहीं है ।” saint बोले –“ बेटा! तेरी बात सुनकर ही मैने तुझे ये एक रुपया का सिक्का दिया है । मुझे ये एक रूपये का सिक्का पड़ा हुआ मिला था और मैंने सोचा था कि इसे सबसे दरिद्र व्यक्ति को दूँगा । आज तुम से मिल कर लगा कि सबसे दरिद्र यदि कोई है, तो वो तुम ही हो, जो अपार धन- संपदा का स्वामी होते हुए भी दूसरों का घर लूटने चला है ।” saint की बात सुनते ही राजा का सिर शरम से झुक गया और उसे अपनी गलत चाह का भान हो गया और ये एहसास हुआ कि वो गलत है । सबसे बड़ा धन तो संतोष है । जिसके पास संतोष नहीं है उसके लिए अपार धन भी कम पड़ता है और जिसके पास संतोष है उसे फिर अन्य धन- आकर्षण आदि विचलित नहीं कर सकते। जिनके पास सबसे बड़ा धन संतोष का है वे हमेशा अपने और दूसरे सभी लोगों के जीवन में सुख व वैभव और उन्नति का कारण बनते है । और जिनके पास सबसे बड़ा धन संतोष का नहीं है वे दूसरों को लूटते हैं। 
            
फिर king ने अपने जीवन को संतोष कि राह पर चलाने के लिए, खुद को बदलने का संकल्प लिया । और saint का आशीर्वाद ले, खुद को सबसे बड़ा धन संतोष को प्राप्त करने चल पड़ा। 
    
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सूप या चलनी

एक प्रसिद्ध सूफी संत थे । उनके बारे में एक Recognition यह थी कि वो किसी भी व्यक्ति से जब मिलते थे तो मिलते ही वो एक बार में ही उसके मनोभावों को भाँप लेते थे । और ये जान जाते थे, कि वो व्यक्ति किस प्रकार का है ।

एक बार Sufi saint अपने शिष्यों के साथ बैठे ज्ञान चर्चा कर रहे थे, तभी एक फकीर उनसे मिलने आये । उनसे मिलते ही उन्होंने कहा –“सूप आ गया।” 

उसके कुछ देर बाद राज्य का सबसे धनी व्यक्ति उनसे मिलने आया तो वे बोले –“ ये चलनी है ।”  उनके पास खड़े उनके शिष्य ने saint के दोनों वक्तव्य सुने । saint के वक्तव्य सुन उसको बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज उनके guru ने दो व्यक्तियों के विषय में ऐसी अभद्र टिप्पणी क्यों दी?

उसने अपने मन कि जिज्ञासा को बड़े संकोच के साथ अपने guru के सामने प्रकट किया, तो Sufi saint बोले –“ my son! इस world में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो सूप कि तरह बेकार कि वस्तुओं को त्याग कर सार युक्त तत्वों को ग्रहण करतें हैं और दूसरे वो, जो चलनी की तरह काम की वस्तुओं को छोड़ कर बेकार की वस्तुओं को स्वीकार करते हैं ।”

Sufi saint की बात शिष्य की समझ में आ गयी कि जीवन में झूठे व क्षणिक सुख वैभव और धन का त्याग कर परमात्म तत्व को ग्रहण करने वाले को “सूप” और परमात्मा से विमुख होकर सांसारिक भोग पदार्थों को ग्रहण करने वाले धनी व्यक्ति को क्यों उनके guru ने “चलनी” कहा ।        

friends, हर एक व्यक्ति के जीवन कि ये विशेषता होती है, कि उसके जीवन में एक गुण विशेष कर होता है, जो उसे दो categories में बाटता है जिसे हम लोग simple way में सामान्य या असमान्य कहते है aur अच्छा या बुरा बोलते है, जिसको हम प्रतिक रूप में सूप या चलनी भी कह सकते हैं। हम सबकी life भी सूप या चलनी में से किसी एक विशेषता को सम्बोधित करती होगी है। तो आप अपने life में क्या है सूप या चलनी ??? और क्या बनाना चाहते हैं सूप या चलनी... ???
   


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sup ya chalni- a motivational story in Hindi

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सूप या चलनी

एक प्रसिद्ध सूफी संत थे । उनके बारे में एक Recognition यह थी कि वो किसी भी व्यक्ति से जब मिलते थे तो मिलते ही वो एक बार में ही उसके मनोभावों को भाँप लेते थे । और ये जान जाते थे, कि वो व्यक्ति किस प्रकार का है ।

एक बार Sufi saint अपने शिष्यों के साथ बैठे ज्ञान चर्चा कर रहे थे, तभी एक फकीर उनसे मिलने आये । उनसे मिलते ही उन्होंने कहा –“सूप आ गया।” 

उसके कुछ देर बाद राज्य का सबसे धनी व्यक्ति उनसे मिलने आया तो वे बोले –“ ये चलनी है ।”  उनके पास खड़े उनके शिष्य ने saint के दोनों वक्तव्य सुने । saint के वक्तव्य सुन उसको बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज उनके guru ने दो व्यक्तियों के विषय में ऐसी अभद्र टिप्पणी क्यों दी?

उसने अपने मन कि जिज्ञासा को बड़े संकोच के साथ अपने guru के सामने प्रकट किया, तो Sufi saint बोले –“ my son! इस world में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो सूप कि तरह बेकार कि वस्तुओं को त्याग कर सार युक्त तत्वों को ग्रहण करतें हैं और दूसरे वो, जो चलनी की तरह काम की वस्तुओं को छोड़ कर बेकार की वस्तुओं को स्वीकार करते हैं ।”

Sufi saint की बात शिष्य की समझ में आ गयी कि जीवन में झूठे व क्षणिक सुख वैभव और धन का त्याग कर परमात्म तत्व को ग्रहण करने वाले को “सूप” और परमात्मा से विमुख होकर सांसारिक भोग पदार्थों को ग्रहण करने वाले धनी व्यक्ति को क्यों उनके guru ने “चलनी” कहा ।        

friends, हर एक व्यक्ति के जीवन कि ये विशेषता होती है, कि उसके जीवन में एक गुण विशेष कर होता है, जो उसे दो categories में बाटता है जिसे हम लोग simple way में सामान्य या असमान्य कहते है aur अच्छा या बुरा बोलते है, जिसको हम प्रतिक रूप में सूप या चलनी भी कह सकते हैं। हम सबकी life भी सूप या चलनी में से किसी एक विशेषता को सम्बोधित करती होगी है। तो आप अपने life में क्या है सूप या चलनी ??? और क्या बनाना चाहते हैं सूप या चलनी... ???
   


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सोने की कुल्हाड़ी


gold axes


एक Village में एक लकडहारा रहता था । वह जंगल से लकड़ियों को काटकर बेचता था, और उससे जो money प्राप्त होती थी, उसी से वह अपनी जीविका चलाता था । और एक संतुष्टित जीवन का भोग कर रहा था ।

एक दिन jungle में वह लकड़ियाँ काटने गया, वहां एक river बहती थी । वह उस नदी किनारे लगे एक पेड़ से लकड़ियाँ काटने लगा, तभी लकड़ियाँ काटते हुए उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गयी । नदी का पानी गहरा था । लकडहारा यह सोच कर परेशान हो उठा, कि इतने गहरे पानी से वह अपनी कुल्हाड़ी कैसे निकले? तभी वहां नदी से एक देवता प्रकट हुए । उन्होंने लकडहारे से उसकी परेशानी का सबब पूछा तो लकडहारे ने कहा- “भगवन ! मेरे जीवन को चलाने वाली मेरी एक मात्र कुल्हाड़ी नदी में गिर गई है और नदी का water बहुत गहरा है, मैं उसे कैसे निकालूं ये सोच रहा हूँ ।“           
  
तब God ने कहा तुम परेशान मत हो मैं तुम्हारी axe निकाल देता हूँ और यह कह कर वो नदी के अंदर गये और एक कुल्हाड़ी निकाल लाये और लकडहारे को  दे दी। वह कुल्हाड़ी चाँदी कि थी। silver की कुल्हाड़ी देख कर लकडहारे ने God  से कहा- “ प्रभु क्षमा करे! यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है ।

देवता ने दुबारा नदी में प्रवेश किया और दूसरी कुल्हाड़ी निकाल कर लकडहारे को दी यह सोने कि थी । लकडहारे ने Gold की कुल्हाड़ी देखते ही, देवता से कहा – “क्षमा प्रभु ! पर ये कुल्हाड़ी भी मेरी नहीं है ।" और कुल्हाड़ी लेने से मन कर दिया।

इस पर देवता पुनः नदी में गये और इस बार लोहे कि कुल्हाड़ी निकल कर लकडहारे को दी। उस कुल्हाड़ी को देख कर लकडहारा खुश हो गया और देवता से बोला- “हाँ यही है मेरी कुल्हाड़ी जो मेरी life चलाती है।"

तब देवता ने लकडहारे को सोने और चाँदी की वो दोनों कुल्हाड़ियाँ भी देते हुए उससे कहाँ पुत्र में तुम्हारी ईमानदारी से बहुत प्रसन्न हूँ तुम ये तीनों कुल्हाड़ियाँ रखो और सुख से अपना जीवन यापन करो।"

लकडहारा कुल्हाड़ियों को ले कर गाँव वापस आ गया और अपने friend को सारी  बात बताई। लकडहारे कि सारी बाते सुन कर, उसके friend के मन में लालच आ गया और वो भी अगले दिन नदी किनारे wood काटने पहुँच गया। और लकड़ियाँ काटने लगा । उसने जान बूझ कर अपनी कुल्हाड़ी river में गिरा दी ।

नदी के God प्रकट हए और silver की कुल्हाड़ी निकाल कर दी, उसे देख वो बोला- नहीं ये मेरी नहीं है । तब देवता ने सोने कि कुल्हाड़ी निकाली और पूछा क्या यह तुम्हारी है? Gold की कुल्हाड़ी देखते ही वह बोला - “यही मेरी कुल्हाड़ी है।” 

देवता यह सुनते ही अदृश्य हो गये और एक आकाश वाणी हुई – “ रे मुर्ख! असत्य वचन बोलकर तूने देव शक्तियों को कुपित किया है । अब तेरी लाहे की कुल्हाड़ी भी जलमग्न ही रहेगी ।“ वह व्यक्ति अपना एक- मात्र जीवन यापन के साधन को गवां कर घर लौटा ।

दोस्तों! ये सच है कि देवता देते है पर उनकी कृपा और उनके अनुदान सत्पात्रों को ही मिलते हैं बाकी झूठे मक्कार लोग तो केवल हाथ मलते रह जाते  हैं। उन्हें कभी कुछ नहीं मिलता।                



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Gold Axes- an inspirational story in Hindi -( सोने की कुल्हाड़ी)


सोने की कुल्हाड़ी


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एक Village में एक लकडहारा रहता था । वह जंगल से लकड़ियों को काटकर बेचता था, और उससे जो money प्राप्त होती थी, उसी से वह अपनी जीविका चलाता था । और एक संतुष्टित जीवन का भोग कर रहा था ।

एक दिन jungle में वह लकड़ियाँ काटने गया, वहां एक river बहती थी । वह उस नदी किनारे लगे एक पेड़ से लकड़ियाँ काटने लगा, तभी लकड़ियाँ काटते हुए उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गयी । नदी का पानी गहरा था । लकडहारा यह सोच कर परेशान हो उठा, कि इतने गहरे पानी से वह अपनी कुल्हाड़ी कैसे निकले? तभी वहां नदी से एक देवता प्रकट हुए । उन्होंने लकडहारे से उसकी परेशानी का सबब पूछा तो लकडहारे ने कहा- “भगवन ! मेरे जीवन को चलाने वाली मेरी एक मात्र कुल्हाड़ी नदी में गिर गई है और नदी का water बहुत गहरा है, मैं उसे कैसे निकालूं ये सोच रहा हूँ ।“           
  
तब God ने कहा तुम परेशान मत हो मैं तुम्हारी axe निकाल देता हूँ और यह कह कर वो नदी के अंदर गये और एक कुल्हाड़ी निकाल लाये और लकडहारे को  दे दी। वह कुल्हाड़ी चाँदी कि थी। silver की कुल्हाड़ी देख कर लकडहारे ने God  से कहा- “ प्रभु क्षमा करे! यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है ।

देवता ने दुबारा नदी में प्रवेश किया और दूसरी कुल्हाड़ी निकाल कर लकडहारे को दी यह सोने कि थी । लकडहारे ने Gold की कुल्हाड़ी देखते ही, देवता से कहा – “क्षमा प्रभु ! पर ये कुल्हाड़ी भी मेरी नहीं है ।" और कुल्हाड़ी लेने से मन कर दिया।

इस पर देवता पुनः नदी में गये और इस बार लोहे कि कुल्हाड़ी निकल कर लकडहारे को दी। उस कुल्हाड़ी को देख कर लकडहारा खुश हो गया और देवता से बोला- “हाँ यही है मेरी कुल्हाड़ी जो मेरी life चलाती है।"

तब देवता ने लकडहारे को सोने और चाँदी की वो दोनों कुल्हाड़ियाँ भी देते हुए उससे कहाँ पुत्र में तुम्हारी ईमानदारी से बहुत प्रसन्न हूँ तुम ये तीनों कुल्हाड़ियाँ रखो और सुख से अपना जीवन यापन करो।"

लकडहारा कुल्हाड़ियों को ले कर गाँव वापस आ गया और अपने friend को सारी  बात बताई। लकडहारे कि सारी बाते सुन कर, उसके friend के मन में लालच आ गया और वो भी अगले दिन नदी किनारे wood काटने पहुँच गया। और लकड़ियाँ काटने लगा । उसने जान बूझ कर अपनी कुल्हाड़ी river में गिरा दी ।

नदी के God प्रकट हए और silver की कुल्हाड़ी निकाल कर दी, उसे देख वो बोला- नहीं ये मेरी नहीं है । तब देवता ने सोने कि कुल्हाड़ी निकाली और पूछा क्या यह तुम्हारी है? Gold की कुल्हाड़ी देखते ही वह बोला - “यही मेरी कुल्हाड़ी है।” 

देवता यह सुनते ही अदृश्य हो गये और एक आकाश वाणी हुई – “ रे मुर्ख! असत्य वचन बोलकर तूने देव शक्तियों को कुपित किया है । अब तेरी लाहे की कुल्हाड़ी भी जलमग्न ही रहेगी ।“ वह व्यक्ति अपना एक- मात्र जीवन यापन के साधन को गवां कर घर लौटा ।

दोस्तों! ये सच है कि देवता देते है पर उनकी कृपा और उनके अनुदान सत्पात्रों को ही मिलते हैं बाकी झूठे मक्कार लोग तो केवल हाथ मलते रह जाते  हैं। उन्हें कभी कुछ नहीं मिलता।                



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