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तलास- नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद की

Sad guru ki Tallas

Talaas – Narendra Se Swami Vivekanand Ki

बात उस समय की है जब Swami Vivekananda नरेंद्र के नाम से जाने जाते थे और वो ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक great teacher की तलाश में थे वो एक महान ज्ञानी की तलाश में थे, जो उनको सही direction दिखा सकें व जीवनोपयोग ज्ञान प्रदान करे, जिससे वो अपने जीवन पथ पर निरंतर (regular) उन्नति करते जाये

Vivekananda को बहुत से लोगों ने भिन्न – भिन्न गुरुओं के पास जाने की सलाह दी। और वो बहुत से teachers के पास गये पर उनको उनसे वो नहीं मिला, जिसकी उनको तलाश थी, वो उनसे संतुष्ट नहीं हुए ।

Vivekananda को learning (ज्ञान प्राप्ति की ) की इतनी प्यास थी की वो अपनी इस असफलता से  निराश नहीं हुए, और वो इस थका देने वाली अपनी खोज में continuously लगे रहे

तभी उनको किसी ने Swami Ramakrishna Param Hans के पास जाने की सलाह दी। विवेकानंद जी ने भी उनके बारे में बहुत – कुछ सुना था, इसलिए वो उनसे मिलने को व्याकुल हो उठे, पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस किसी को अपना student आसानी से नहीं बनाते थे । और जिनको वो अपना student बनाते थे, उनका वो बहुत कठिन exam लेते थे । अत: उनका शिष्य बन पाना बहुत कठिन था ।

लेकिन विवेकानंद तो ज्ञान के प्यासे थे, इसलिए वो एक दिन स्वमी रामकृष्ण परमहंस के घर पहुँच ही गये । उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो अंदर से स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने पूँछा “ कौन है ?” इस पर विवेकानंद जी ने बड़ी ही सहजता से answer दिया –“ यही तो जानने आया हूँ कि मैं कौन हूँ ।” विवेकानंद का answer सुनकर, स्वामी रामकृष्ण परमहंस खुश हो गए और उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से विवेकानंद को अपना शिष्य बना लिया ।

एक great guru को पा कर, Vivekananda की तलाश जब पूर्ण हो गयी, तब जा कर उनके शिष्य मन को शान्ति मिली । और साथ ही ज्ञान प्राप्ति के मार्गों की talaas को एक नया आयाम । 


Friend’s, आप को मेरी तलास- नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद की” motivational story, Hindi में कैसी लगीक्या ये story सबकी life (personality) में positivity ला सकने में कुछ सहयोगी हो सकेगी, if yes तो please comments के द्वारा जरुर बताये   


Talaas – Narendra Se Swami Vivekanand ki- A Motivational Article in Hindi




तलास- नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद की

Sad guru ki Tallas

Talaas – Narendra Se Swami Vivekanand Ki

बात उस समय की है जब Swami Vivekananda नरेंद्र के नाम से जाने जाते थे और वो ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक great teacher की तलाश में थे वो एक महान ज्ञानी की तलाश में थे, जो उनको सही direction दिखा सकें व जीवनोपयोग ज्ञान प्रदान करे, जिससे वो अपने जीवन पथ पर निरंतर (regular) उन्नति करते जाये

Vivekananda को बहुत से लोगों ने भिन्न – भिन्न गुरुओं के पास जाने की सलाह दी। और वो बहुत से teachers के पास गये पर उनको उनसे वो नहीं मिला, जिसकी उनको तलाश थी, वो उनसे संतुष्ट नहीं हुए ।

Vivekananda को learning (ज्ञान प्राप्ति की ) की इतनी प्यास थी की वो अपनी इस असफलता से  निराश नहीं हुए, और वो इस थका देने वाली अपनी खोज में continuously लगे रहे

तभी उनको किसी ने Swami Ramakrishna Param Hans के पास जाने की सलाह दी। विवेकानंद जी ने भी उनके बारे में बहुत – कुछ सुना था, इसलिए वो उनसे मिलने को व्याकुल हो उठे, पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस किसी को अपना student आसानी से नहीं बनाते थे । और जिनको वो अपना student बनाते थे, उनका वो बहुत कठिन exam लेते थे । अत: उनका शिष्य बन पाना बहुत कठिन था ।

लेकिन विवेकानंद तो ज्ञान के प्यासे थे, इसलिए वो एक दिन स्वमी रामकृष्ण परमहंस के घर पहुँच ही गये । उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो अंदर से स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने पूँछा “ कौन है ?” इस पर विवेकानंद जी ने बड़ी ही सहजता से answer दिया –“ यही तो जानने आया हूँ कि मैं कौन हूँ ।” विवेकानंद का answer सुनकर, स्वामी रामकृष्ण परमहंस खुश हो गए और उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से विवेकानंद को अपना शिष्य बना लिया ।

एक great guru को पा कर, Vivekananda की तलाश जब पूर्ण हो गयी, तब जा कर उनके शिष्य मन को शान्ति मिली । और साथ ही ज्ञान प्राप्ति के मार्गों की talaas को एक नया आयाम । 


Friend’s, आप को मेरी तलास- नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद की” motivational story, Hindi में कैसी लगीक्या ये story सबकी life (personality) में positivity ला सकने में कुछ सहयोगी हो सकेगी, if yes तो please comments के द्वारा जरुर बताये   



Gandhi ji,- मैंने सुना है कि आप के ashram में महात्मा बनते हैं,
मैं mahatma बनना चाहता हूँ,

Gandhi is a great mahatma 

Gandhi ji, I heard that  Mahatma are formed in your ashram, 

I want to be mahatma,

एक बार Mahatma Gandhi जी के ashram में के बालक आया और गाँधी जी से बोला – “मैं स्वयं को महात्मा बना, समाज को समर्पित करना चाहता हूँ । समाज की सेवा करना चाहता हूँ । मैंने सुना है कि आप के ashram में महात्मा बनते हैं, मैं mahatma बनना चाहता हूँ, आप जैसा । मुझे mahatma बनने के गुर शिखा दीजिये ।”
Mahatma Gandhi जी को ashram के सब लोग bapu ji कह कर पुकारते थे । bapu जी ने उस बालक से कहा “ठीक है- तुम ashram में रहो और जो कार्य दिए जाये उनको करो और जो सिखाया जाये वो सीखो, यदी तुम ये सब श्रद्धा से कर सके तो तुम जो बनना चाहते हो बन जाओगे । Mahatma भी बन जाओगे।”
बालक Gandhi ji के ashram में रहने लगा ।

Gandhi ji के ashram जो लोग रहते थे उन्हें ashram में सफाई और व्यवस्था के कार्यों को अनिवार्य रूप से करना पड़ता था । समाज को सर्पित इस बालक को भी बाकि लोगों कि तरह ही साफ –सफाई के , स्वच्छता – व्यवस्था के कार्य दिए गये । जिनको वह बड़ी ही श्रद्धा और विनम्रता के साथ निष्ठापूर्वक पूरा करता रहता। जो भी उसे बतलाया जाता उसे वह अपने jeevan का अंग बना  लेता। इस प्रकार वह ashram jeevan को स्वयं में उतारता चला गया ।   
  
फिर जब उसके ashram निवास की अवधि पूरी हो गयी, तो वह Gandhi ji से भेंट करने गया और उनसे कहा- “ bapu ! मैं तो यहाँ आप के पास mahatma बनने के गुर सीखने आया था, पर यहाँ तो मुझे साफ- सफाई और व्यवस्था के सामन्य से कार्य ही करने को मिले । mahatma बनने के सूत्र न तो बताये गये और न ही उनका कोई अभ्यास कराया गया ।”

bapu ने बड़े pyar से बालक के sir पर अपना हाथ फेरा, और उसको समझाया। वो बालक से बोले –“ बेटे ! तुम्हे यहाँ जो भी संस्कार मिले हैं, वे सब mahatma बनने की सीढ़ियाँ हैं । सफाई – वयवस्था के छोटे –छोटे कामों और बातों के द्वारा, जिस तन्मयता से यहाँ तुम्हारी बुद्धि का विकास कराया गया है । यही बुद्धि मनुष्य को साधारण मनुष्य से महामानव बनाती है । जो सब्र और सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण का अभ्यास तुम्हारे शरीर ने यहाँ किया है उससे ही एक व्यक्ति mahatma बनता है ।”

बापू की ये बात समझ, बालक अपने mahatma पथ पर आगे बढ़ गया, अपनी country और society की सच्ची सेवा करने ।

Gandhi जी ने इसी प्रकार अपने ashram में छोटे छोटे सद्गुणों के महत्व को को समझाते हुए अनेको लोगों के जीवन क्रम को बदला और अनेक लोकसेवियों को बनाया , उन्हें सच्चे स्वयं सेवक के रूप में विकसित किया और अपनी country को सच्चे mahatma दिए ।

friends, आज अपना देश आजाद हो चुका है फिर भी आज जो स्थिति है उसके अनुसार देश को आज भी ऐसे ही mahatma बनने वाले और mahatma बनाने वाले सच्चे स्वयंसेवकों की जरूरत है । जो सिर्फ अपना ही नहीं country और society के विकास के बारे में निःस्वार्थ भाव से सोचे और उसके लिए जो बन सके वो उसे कर्तव्य निष्ठ हो पूर्ण रूपेण करें ।

jai Hind, jai Bharat.

Request- Friends, आपको मेरा ये Gandhi ji और उनके ashram पर Hindi में लिखा गया ये inspirational article कैसा लगा..? please ये comments के दवारा अवश्य बताएं और यदी आप को ये पसंद आया हो तो please इसे अपने दोस्तों के साथ share करें ।

            

Gandhi ji, - I heard that Mahatma are formed in your ashram , I want to be mahatma,- Inspirational and Motivational article in Hindi


Gandhi ji,- मैंने सुना है कि आप के ashram में महात्मा बनते हैं,
मैं mahatma बनना चाहता हूँ,

Gandhi is a great mahatma 

Gandhi ji, I heard that  Mahatma are formed in your ashram, 

I want to be mahatma,

एक बार Mahatma Gandhi जी के ashram में के बालक आया और गाँधी जी से बोला – “मैं स्वयं को महात्मा बना, समाज को समर्पित करना चाहता हूँ । समाज की सेवा करना चाहता हूँ । मैंने सुना है कि आप के ashram में महात्मा बनते हैं, मैं mahatma बनना चाहता हूँ, आप जैसा । मुझे mahatma बनने के गुर शिखा दीजिये ।”
Mahatma Gandhi जी को ashram के सब लोग bapu ji कह कर पुकारते थे । bapu जी ने उस बालक से कहा “ठीक है- तुम ashram में रहो और जो कार्य दिए जाये उनको करो और जो सिखाया जाये वो सीखो, यदी तुम ये सब श्रद्धा से कर सके तो तुम जो बनना चाहते हो बन जाओगे । Mahatma भी बन जाओगे।”
बालक Gandhi ji के ashram में रहने लगा ।

Gandhi ji के ashram जो लोग रहते थे उन्हें ashram में सफाई और व्यवस्था के कार्यों को अनिवार्य रूप से करना पड़ता था । समाज को सर्पित इस बालक को भी बाकि लोगों कि तरह ही साफ –सफाई के , स्वच्छता – व्यवस्था के कार्य दिए गये । जिनको वह बड़ी ही श्रद्धा और विनम्रता के साथ निष्ठापूर्वक पूरा करता रहता। जो भी उसे बतलाया जाता उसे वह अपने jeevan का अंग बना  लेता। इस प्रकार वह ashram jeevan को स्वयं में उतारता चला गया ।   
  
फिर जब उसके ashram निवास की अवधि पूरी हो गयी, तो वह Gandhi ji से भेंट करने गया और उनसे कहा- “ bapu ! मैं तो यहाँ आप के पास mahatma बनने के गुर सीखने आया था, पर यहाँ तो मुझे साफ- सफाई और व्यवस्था के सामन्य से कार्य ही करने को मिले । mahatma बनने के सूत्र न तो बताये गये और न ही उनका कोई अभ्यास कराया गया ।”

bapu ने बड़े pyar से बालक के sir पर अपना हाथ फेरा, और उसको समझाया। वो बालक से बोले –“ बेटे ! तुम्हे यहाँ जो भी संस्कार मिले हैं, वे सब mahatma बनने की सीढ़ियाँ हैं । सफाई – वयवस्था के छोटे –छोटे कामों और बातों के द्वारा, जिस तन्मयता से यहाँ तुम्हारी बुद्धि का विकास कराया गया है । यही बुद्धि मनुष्य को साधारण मनुष्य से महामानव बनाती है । जो सब्र और सहनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण का अभ्यास तुम्हारे शरीर ने यहाँ किया है उससे ही एक व्यक्ति mahatma बनता है ।”

बापू की ये बात समझ, बालक अपने mahatma पथ पर आगे बढ़ गया, अपनी country और society की सच्ची सेवा करने ।

Gandhi जी ने इसी प्रकार अपने ashram में छोटे छोटे सद्गुणों के महत्व को को समझाते हुए अनेको लोगों के जीवन क्रम को बदला और अनेक लोकसेवियों को बनाया , उन्हें सच्चे स्वयं सेवक के रूप में विकसित किया और अपनी country को सच्चे mahatma दिए ।

friends, आज अपना देश आजाद हो चुका है फिर भी आज जो स्थिति है उसके अनुसार देश को आज भी ऐसे ही mahatma बनने वाले और mahatma बनाने वाले सच्चे स्वयंसेवकों की जरूरत है । जो सिर्फ अपना ही नहीं country और society के विकास के बारे में निःस्वार्थ भाव से सोचे और उसके लिए जो बन सके वो उसे कर्तव्य निष्ठ हो पूर्ण रूपेण करें ।

jai Hind, jai Bharat.

Request- Friends, आपको मेरा ये Gandhi ji और उनके ashram पर Hindi में लिखा गया ये inspirational article कैसा लगा..? please ये comments के दवारा अवश्य बताएं और यदी आप को ये पसंद आया हो तो please इसे अपने दोस्तों के साथ share करें ।

            

गाँधी जी और गुलाब के पौधे

shabermati aashram

साबरमती के आश्रम में माघ का सूर्य चमक रहा था। चारों तरफ सुंदर – सुरम्य पवित्र वातावरण था । चिड़ियों की चहचहाहट और राम नाम का सुमिरन आश्रम के सुंदर वातावरण को और भी मंगलमय बना रहा था । हलके कोहरे में सूर्य देव ने दर्शन दिए थे ।

‘बा’ बापू जी के पास आयी और बोली –“आज दोपहर धूप अच्छी खिली है, आप कहे तो में आप के पैरों को साफ कर दूँ । आप के पैरों में बिवाई फट गयी हैं ।”

बापू जी ने बड़े स्नेह से कहा –“ उचित है । पर ध्यान रखना water की एक भी बूंद बेकार न जाने पाए ।” Mahatma Gandhi ‘बा’ को हमेशा water बेकार न जाने पाए इसकी हिदायत देते रहते थे ।  

‘बा’ गरम पानी ले आयी और बापू जी के पैर धोने लगी । “पानी बेकार न जा ने पाए इसलिए Gandhi ji की हिदायत के अनुसार ‘बा’ water को इधर – उधर न डाल कर, हमेशा पौधे में डाल देती थी ।” आज वो बापू जी के पैरों को धोने के बाद बचे पानी को गुलाब के पौधे में डाल दिया ।

beautiful rose plant  

Gandhi ji, गुलाब के पौधे को बड़ी देर तक नाराजगी भरी दृष्टि से देखते रहे । उनको इस तरह गुलाब के पौधों को देखता देख ‘बा’ ने बापू जी से इसका कारण पूंछा । तो बापू जी ने कहा –“ फूलों के ये पौधे सुंदर होते हुए भी मुझे काटों की तरह बुरे लगते हैं । इन फूलों के पौधों के स्थान पर यदी शाक – सब्जी उगाये होते, तो उनसे हममे से किसी का पेट तो पलता । पौधों के रख – रखाव का कुछ सार्थक परिणाम तो हस्तगत होता ।”

friends, Gandhi ji हमेशा हर वस्तु का उचित और अधिक से अधिक वो सब के लिए useful हो ऐसा प्रयास करते थे । वो हर पल का, हर वस्तु का सदुपयोग हो हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे और सभी को रखने की शिक्षा देते थे ।

Gandhi ji का जीवन स्वयं में एक पाठ शाला थी । उनकी शिक्षाओं को जिसने भी अपने जीवन में उतरा है उनका जीवन धन्य और उपयोगी बन गया ।


     
            

   

   

motivational story in Hindi-- "Mahatma Gandhi and the rose plant"- गाँधी जी और गुलाब के पौधे


गाँधी जी और गुलाब के पौधे

shabermati aashram

साबरमती के आश्रम में माघ का सूर्य चमक रहा था। चारों तरफ सुंदर – सुरम्य पवित्र वातावरण था । चिड़ियों की चहचहाहट और राम नाम का सुमिरन आश्रम के सुंदर वातावरण को और भी मंगलमय बना रहा था । हलके कोहरे में सूर्य देव ने दर्शन दिए थे ।

‘बा’ बापू जी के पास आयी और बोली –“आज दोपहर धूप अच्छी खिली है, आप कहे तो में आप के पैरों को साफ कर दूँ । आप के पैरों में बिवाई फट गयी हैं ।”

बापू जी ने बड़े स्नेह से कहा –“ उचित है । पर ध्यान रखना water की एक भी बूंद बेकार न जाने पाए ।” Mahatma Gandhi ‘बा’ को हमेशा water बेकार न जाने पाए इसकी हिदायत देते रहते थे ।  

‘बा’ गरम पानी ले आयी और बापू जी के पैर धोने लगी । “पानी बेकार न जा ने पाए इसलिए Gandhi ji की हिदायत के अनुसार ‘बा’ water को इधर – उधर न डाल कर, हमेशा पौधे में डाल देती थी ।” आज वो बापू जी के पैरों को धोने के बाद बचे पानी को गुलाब के पौधे में डाल दिया ।

beautiful rose plant  

Gandhi ji, गुलाब के पौधे को बड़ी देर तक नाराजगी भरी दृष्टि से देखते रहे । उनको इस तरह गुलाब के पौधों को देखता देख ‘बा’ ने बापू जी से इसका कारण पूंछा । तो बापू जी ने कहा –“ फूलों के ये पौधे सुंदर होते हुए भी मुझे काटों की तरह बुरे लगते हैं । इन फूलों के पौधों के स्थान पर यदी शाक – सब्जी उगाये होते, तो उनसे हममे से किसी का पेट तो पलता । पौधों के रख – रखाव का कुछ सार्थक परिणाम तो हस्तगत होता ।”

friends, Gandhi ji हमेशा हर वस्तु का उचित और अधिक से अधिक वो सब के लिए useful हो ऐसा प्रयास करते थे । वो हर पल का, हर वस्तु का सदुपयोग हो हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे और सभी को रखने की शिक्षा देते थे ।

Gandhi ji का जीवन स्वयं में एक पाठ शाला थी । उनकी शिक्षाओं को जिसने भी अपने जीवन में उतरा है उनका जीवन धन्य और उपयोगी बन गया ।


     
            

   

   


नारियल और पत्थर 
ganga ka suvash 

Coconut and stone

गंगा का सुरमय तट था, तट के किनारे बहुत ही सुंदर –सुंदर व सुगंधित पेड़-पोधों के झुरमुट आनंद में डूबे मधुर बहती सलिल के साथ अठखेलियाँ कर रहे थे चारों तरफ सुंदर सुवाश फैला था

वहीँ Coconut के लम्बे – लम्बे वृक्ष आसमान की उचाईयों को छू कर गंगा के इस तट की सुन्दरता को और गर्वान्वित करा रहे थे । और वहीँ नारियल के फल स्वयं को peak of the tree पर देख मद-मस्त थे ।


Coconut tree

वहीँ तट के किनारे एक stone भी अपना मधुरमय जीवन श्रद्धा से नदी की आती – जाती लहरों के साथ बड़ी आत्मीयता से व्यतीत कर रहा था । लहरें आती उससे टकराती और चली जाती । कभी – कभी कोई मुसाफिर निकलता तो उस पत्थर पर विश्राम कर आगे बढ़ जाता । तो कभी कोई राहगीर के पैरों तले आ जाता तो वह राहगीर से कष्ट के लिए क्षमा मांग लेता । इस तरह वो श्रद्धा से गंगा तट पर लहरों के साथ अठखेलियाँ करता विनम्र और शान्तमय life जिए जा रहा था ।

one day, नदी के तट पर लगे नारियल के पेड़ से एक नारिकेली पत्थर के इस जीवन को बड़े ध्यान से देख रहा था । वह अपने जन्मदाता के सर्वोच्च स्थान पर विराजित था इस बात का उसे बहुत proud था । उस ने उस पत्थर से कहा –“ रे पत्थर ! तेरी भी क्या जिंदगी है । तू तो हर आने- जाने वालों की ठोकरें खाता है। यहाँ तक कि तुम जिस नदी के किनारे पड़े हो उसकी लहरें भी तुमे टक्कर मार – मार कर चोटिल करती रहती हैं । तुम्हें अपमानित करती हैं । अपमान की भी हद होती है, पर तुम को क्या, तुम तो बड़े बेशरम हो । मुझे देखो, मैं कितने स्वाभिमान से कितनी उन्नत स्थिति में बैठा मौज कर रहा हूँ । यहाँ पेड़ के सर्वोच्चतम स्थान से सारी दुनिया का नजारा देखता हूँ । तुम तो लगता है ऊहीं घिसते- घिसते ही मर जाओगे ।”


stone 

पत्थर ने नारियल के फल की बात चुप- चाप सुन ली, पर कहा कुछ नहीं, बस मौन की नीरवता में अपनी जीवन साधना करता रहा । और वैसे ही लहरों के साथ टकराता रहा और घिसता रहा पर उफ़ ना किया । घिसते - घिसते छोटा और गोल हो गया ।

one day, एक pujari उधर से गुजर रहा था, तो उसने गोल आकृति के इस पत्थर को देखा और कहा- “ये तो शालिग्राम है ।” फिर उस पत्थर को वह उठा कर अपने temple में ले आया और श्रद्धा से temple में स्थापित कर दिया ।

उधर गंगा तट पर one night, तेज आँधी आयी और वो Coconut fruitअपने जन्मदाता से अलग हो जमीन पर आ गिरा और दो टुकड़े हो गया। वहां से एक लड़का निकला और उसने उस उस नारियल को उठा कर temple ले आया और temple में उसे उस पत्थर पर चढ़ा दिया, जो अब शालिग्राम बन गया था ।

नारियल टूट गया था, पर उसका अभिमान कम न हुआ था । उसके हाव – भाव में स्वयं को God पर चढ़ाये जाने के अभिमान से पूर्ण भाव स्पष्ट नज़र आ रहे थे ।

नारियल की इस भाव मुद्रा को देख शालिग्राम पत्थर बोल उठा – “ हे नारिकेली ! देखा तुमने घिसने का परिणाम । हम तो घिस – घिस कर परिमार्जित हो साधारण पत्थर से शालिग्राम बन प्रभु चरणों में आ गये । जहाँ हमारी पूजा होती है और तुम कहाँ इतनी उचाई पर थे पर अब कहाँ हो.... तुम्हारा तो अस्तित्व ही समाप्ति पर है। अब तो तुम समझ जाओ कि अभिमान के मद में मतवालों की दुर्गति ही होती है।”          
नारियल अब सब साझ गया था और आसूँ बहा रहा था, पर अब बहुत देर हो गयी थी...  



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Coconut and stone- नारियल और पत्थर- A inspirational and motivational story and article in Hindi



नारियल और पत्थर 
ganga ka suvash 

Coconut and stone

गंगा का सुरमय तट था, तट के किनारे बहुत ही सुंदर –सुंदर व सुगंधित पेड़-पोधों के झुरमुट आनंद में डूबे मधुर बहती सलिल के साथ अठखेलियाँ कर रहे थे चारों तरफ सुंदर सुवाश फैला था

वहीँ Coconut के लम्बे – लम्बे वृक्ष आसमान की उचाईयों को छू कर गंगा के इस तट की सुन्दरता को और गर्वान्वित करा रहे थे । और वहीँ नारियल के फल स्वयं को peak of the tree पर देख मद-मस्त थे ।


Coconut tree

वहीँ तट के किनारे एक stone भी अपना मधुरमय जीवन श्रद्धा से नदी की आती – जाती लहरों के साथ बड़ी आत्मीयता से व्यतीत कर रहा था । लहरें आती उससे टकराती और चली जाती । कभी – कभी कोई मुसाफिर निकलता तो उस पत्थर पर विश्राम कर आगे बढ़ जाता । तो कभी कोई राहगीर के पैरों तले आ जाता तो वह राहगीर से कष्ट के लिए क्षमा मांग लेता । इस तरह वो श्रद्धा से गंगा तट पर लहरों के साथ अठखेलियाँ करता विनम्र और शान्तमय life जिए जा रहा था ।

one day, नदी के तट पर लगे नारियल के पेड़ से एक नारिकेली पत्थर के इस जीवन को बड़े ध्यान से देख रहा था । वह अपने जन्मदाता के सर्वोच्च स्थान पर विराजित था इस बात का उसे बहुत proud था । उस ने उस पत्थर से कहा –“ रे पत्थर ! तेरी भी क्या जिंदगी है । तू तो हर आने- जाने वालों की ठोकरें खाता है। यहाँ तक कि तुम जिस नदी के किनारे पड़े हो उसकी लहरें भी तुमे टक्कर मार – मार कर चोटिल करती रहती हैं । तुम्हें अपमानित करती हैं । अपमान की भी हद होती है, पर तुम को क्या, तुम तो बड़े बेशरम हो । मुझे देखो, मैं कितने स्वाभिमान से कितनी उन्नत स्थिति में बैठा मौज कर रहा हूँ । यहाँ पेड़ के सर्वोच्चतम स्थान से सारी दुनिया का नजारा देखता हूँ । तुम तो लगता है ऊहीं घिसते- घिसते ही मर जाओगे ।”


stone 

पत्थर ने नारियल के फल की बात चुप- चाप सुन ली, पर कहा कुछ नहीं, बस मौन की नीरवता में अपनी जीवन साधना करता रहा । और वैसे ही लहरों के साथ टकराता रहा और घिसता रहा पर उफ़ ना किया । घिसते - घिसते छोटा और गोल हो गया ।

one day, एक pujari उधर से गुजर रहा था, तो उसने गोल आकृति के इस पत्थर को देखा और कहा- “ये तो शालिग्राम है ।” फिर उस पत्थर को वह उठा कर अपने temple में ले आया और श्रद्धा से temple में स्थापित कर दिया ।

उधर गंगा तट पर one night, तेज आँधी आयी और वो Coconut fruitअपने जन्मदाता से अलग हो जमीन पर आ गिरा और दो टुकड़े हो गया। वहां से एक लड़का निकला और उसने उस उस नारियल को उठा कर temple ले आया और temple में उसे उस पत्थर पर चढ़ा दिया, जो अब शालिग्राम बन गया था ।

नारियल टूट गया था, पर उसका अभिमान कम न हुआ था । उसके हाव – भाव में स्वयं को God पर चढ़ाये जाने के अभिमान से पूर्ण भाव स्पष्ट नज़र आ रहे थे ।

नारियल की इस भाव मुद्रा को देख शालिग्राम पत्थर बोल उठा – “ हे नारिकेली ! देखा तुमने घिसने का परिणाम । हम तो घिस – घिस कर परिमार्जित हो साधारण पत्थर से शालिग्राम बन प्रभु चरणों में आ गये । जहाँ हमारी पूजा होती है और तुम कहाँ इतनी उचाई पर थे पर अब कहाँ हो.... तुम्हारा तो अस्तित्व ही समाप्ति पर है। अब तो तुम समझ जाओ कि अभिमान के मद में मतवालों की दुर्गति ही होती है।”          
नारियल अब सब साझ गया था और आसूँ बहा रहा था, पर अब बहुत देर हो गयी थी...  



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